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Wednesday, September 16, 2015

आखिर क्यों है इतना कुपोषण ?


हमारा देश ऋषि मुनियो के समय से ही प्रकृति की एक अद्भुत देन है। जहा पर अनेक प्रकार के औषधीय पौधे ,जड़ी बूटी, फल फूल , मेवे , आनाज फसल , वनसप्ति , घी ,दूध सभी चीज़ो का भण्डार  हमेशा से रहा है।  हमारे देश में उन सभी चीज़ो का पर्याप्त भण्डार है जो एक स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक हैं किन्तु फिर भी आज अनेक लोग ऐसे हैं जो कुपोषण के शिकार हैं क्यों की उनको पौष्टिक आहार नही मिल पाता। 

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अगर हम वर्तमान समय की बात करे तो हम पायेगे की हम पैसा कमाने के चक्कर में इतने लालची हो गए हैं की हर चीज़ में मिलावट करने लगे हैं।  दूध ,घी से लेकर फलो एवं सब्जी आदि में रासायनिक पदार्थो को मिलाने लगे हैं।  महंगाई ने इतनी कमर तोड़ राखी है की गरीब  आदमी प्रतिदिन फलो एवं दूध आदि का सेवन भी नही कर पाता। यह हमारे देश की विडंबना ही है की जहा एक ओर मंदिरो के आगे बैठे ,चौराहो  पर बैठे बच्चे एवं बड़े 2 वक़्त की रोटी के लिए मोहताज हैं ,घी दूध तक नसीब नही हो पाता, वही दूसरी ओर अंधविश्वास में डूबे लोग मंदिरो में शिवलिंग पर दूध चढ़ाकर  इतना दूध व्यर्थ करते हैं। जरा सोचिये अगर यही दूध इन जरूरतमंदो को मिलता तो कितना अच्छा होता। 
अभी हाल ही में आई एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार आज सारे विश्व में हर 3 व्यक्तियों में से 1  व्यक्ति कुपोषण का शिकार है। हर देश में आज कुपोषण एक गंभीर समस्या है। एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। हाल ही में "थिंक टैंक इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई)" की ओर  से जारी की गयी ग्लोबल न्यूट्रीशन रिपोर्ट के अनुसार  कुपोषण समाधान के लिए जो उपाय  हैं उन्हें धन, कौशल या राजनीतिक दबाव के कारण लागू किये जाने पर ध्यान नहीं दिया  जा रहा है। 
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि  ‘कुपोषण बदलाव का वाहक या प्रगति का बाधक भी हो सकता है" इसलिए  हर देश के नेताओं को कुपोषण को गंभीरता के साथ लेना चाहिए। इसे किसी भी रूप में खत्म करने का प्रयास करना चाहिए।’ आईएफपीआरआई के वरिष्ठ शोधार्थी और रिपोर्ट के प्रमुख लेखक लॉरेंस हड्डाड ने एक बयान में कहा, ‘जब हममें से हर तीन में एक व्यक्ति अक्षम है तो परिवार, समुदाय और देश के तौर पर हम आगे नहीं बढ़ सकते' . बात भी सही है अगर तीन लोगो में से हर एक लोग कुपोषण का शिकार होगा तो हम कहा से उन्नति करेंगे ?

Thursday, September 10, 2015

आपके पर्श में रखे नोट आपको कर सकते हैं बीमार !


क्या हम कल्पना  कर सकते हैं कि हमारी जेब में रखे पर्श में रखे नोट हमको बीमार भी कर सकते हैं ? शायद नही ! पर ऐसा हो सकता है क्यों कि हमारे पर्श में जो नोट रखे होते हैं उन पर रोग उतपन्न  करने वाले सूक्ष्म जीवाणु लगे हो सकते हैं।  जिनके कारण  त्वचा रोग, पेट की बीमारियों और यहां तक कि तपेदिक जैसी
बीमारी  भी हो सकती है। अभी हाल ही में  वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान केंद्र (CSIR) और जिनोमिक्स एण्ड इंटीग्रेटिव बायलॉजी (IGIB) संस्थान द्वारा किए गए शोध  के अनुसार एक नोट में औसतन कवक (70 फीसदी), बैक्टीरिया (9फीसदी) और विषाणु (एक फीसदी से कम) जीव होते हैं।



IGIB के प्रधान वैज्ञानिक एवं इस शोधपत्र के लेखक एक एस रामचंद्रन जी के अनुसार ‘उन्होने  स्टेफाइलोकोकस ऑरियस और इंरटकोकस फेकैलिस समेत 78 रोगजनक सूक्ष्मजीव की पहचान की है। उनके  विश्लेषण से यह भी पता चला है कि कागज के इन नोट (मुद्रा) पर विविध प्रकार के सूक्ष्मजीव होते हैं और कई एंटीबायोटिक प्रतिरोधी भी होते हैं।’

यदि हम उनके द्वारा लिखे गए शोधपत्र पर प्रकाश डाले तो हम पायेगे की  नोटों के इन रोगजनक सूक्ष्मजीवों से चर्मरोग, कवक और पेट  के संक्रमण, सांस संबंधी परेशानियां और यहां तक तपेदिक भी हो सकती है।

अपने इस शोध के नतीजे तक पहुचने के लिए उन्होने देश की राजधानी  दिल्ली  में रेहड़ी पटरीवालों, किराने की दुकानों, कैंटीन, चाय की दुकानों, हार्डवेयर की दुकानों, दवा की दुकानों आदि से नमूने इकट्ठे किए । उनमें 10, 20 और 100 रुपए के नोट थे जिन पर इन रोगजनक सूक्ष्म जीवाणु को पाया गया जिनका व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है।

यदि हम आस्ट्रेलिया जैसे कुछ अन्य  देशों की बात करे तो वह पर प्लास्टिक के नोटों का प्रचलन है नोट की लाइफटाइम ज्यादा होने के साथ साथ इसका एक कारण  यह भी है कि इन नोटों को इन रोगजनक सूक्ष्म जीवाणु से मुक्त रखा जा सकता है।  इसलिए यह बहुत आवश्यक है की हमको  स्वच्छता के तौर तरीके अपनाना चाहिए तथा इन नोटों को संभालने के बाद किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचने के लिए हाथ को रोगाणुमुक्त कर लेना चाहिए।’

Friday, September 4, 2015

भारतीय वैज्ञानिक डॉ एम. विजय गुप्ता को मिला पहला सुनहाक शांति पुरूस्कार!

आजकल  अक्सर कभी कभी मुझे यह महसूस होता है कि हमारे देश में कुछ व्यक्तिव ऐसे हैं जिनको उनके द्वारा किये गए महत्वपूर्ण कार्यो के लिए , समाज हित में किये गए कार्यो के लिए हमारे देश में उनको  उतना मान सम्मान नही मिल पाता है ,जिसके योग्य वह है। किन्तु विदेशो में उनके कार्यो की न सिर्फ सरहाना की जाती है बल्कि उन्हे सम्मानित भी किया जाता है। हमारे देश का सिस्टम इतना राजनितिक हो चूका है कि यहाँ चुनाव  , किसी अफसर पद पर  चयन से लेकर सम्मान और पुरुस्कारों के लिए नामांकन में भी  राजनीति होती है।  इसका एक ताजा उदाहरण पुणे स्थित फिल्म संस्थान में  अध्यक्ष पद हेतु अभिनेता गजेन्द्र चौहान जी को चुना गया , इसके पीछे भी राजनितिक कारण  बताये जा रहे हैं। 

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खैर यह इस पोस्ट का मूल विषय नहीं है। दरसल अभी हाल ही में भारत और कई देशों में मत्स्य पालन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण  कार्य करने वाले प्रसिद्ध भारतीय कृषि वैज्ञानिक डॉ एम. विजय गुप्ता ( Dr Modadugu Vijay Gupta ) को नोबेल पुरस्कार के विकल्प के तौर पर देखे जा रहे पहले सुनहाक शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्होने अपना यह पुरूस्कार किरिबाती के राष्ट्रपति Anote Tong के साथ शेयर किया है। किरिबाती एक द्वीपीय देश है। 


76 साल के डॉ एम विजय गुप्ता जी को पुरूस्कार  स्वरुप 10 लाख डॉलर की राशि प्रदान की गयी है। डॉ एम विजय गुप्ता  जी को यह सम्मान छोटे द्वीपीय देशो में कार्बन उत्सर्जन को काम करने की दिशा में किये गए महत्वपूर्ण कार्यो के लिए दिया गया है।  यह दीव बढ़ते समुंद्री जल स्तर के कारन 2050  तक डूबने जैसे खतरे का सामना कर रहा है।  उनको यह पुरूस्कार दक्षिण कोरिया की धार्मिक नेता डॉ. हाक जा हान मून ने प्रदान किया। डॉ. हाक जा हान मून स्वर्गीय रेव सुन म्युंग मून जी की पत्नी हैं। जिन्होंने लोगों की भलाई के लिए, स्तर बेहतर बनाने हेतु कारगर प्रयास कर रहे लोगों के काम को मान्यता देने के लिए इस पुरस्कार की स्थापना की थी। 

डॉ एम विजय गुप्ता जी मूल रूप से आंध्रः प्रदेश के बापतला के रहने वाले हैं और वह एक जीव वैज्ञानी है। उन्हे सन 2005 में  मीठे पानी में मछलीपालन  के लिए कम लागत की तकनीकों के विकास एवं प्रसार के लिए 2005 में विश्व खाद्य पुरस्कार भी दिया जा चूका है। नौकरी से रिटायरमेंट से पहले वह वर्ल्डफिश नाम के एक अंतरराष्ट्रीय मत्स्य पालन शोध संस्थान में सहायक महानिदेशक पद पर भी कार्य कर चुके हैं । यह संस्थान मलेशिया में पेनांग में स्थित "Consultative Group on International Agricultural Research "(CGIAR) के अंतर्गत आता है। 

इस क्षेत्र में डॉ एम विजय  गुप्ता जी ने अपने करियर की शुरुवात कोलकाता स्थित Indian Council Agriculture Research से एक वैज्ञानिक के तौर पर की थी। डॉ एम विजय गुप्ता जी लाओस , बांग्लादेश , वियतनाम , फिलीपींस , थाईलैंड आदि देशो में भी कार्य कर चुके हैं। डॉ एम विजय गुप्ता जी मुख्य रूप से एक्वा टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ हैं। उनका कहना है कि  एक्वा टेक्नोलॉजी खाद्य सुरक्षा हेतु एक अच्छा विकल्प है जो की ग्रामीण क्षेत्रो के लोगो के जीवन सुधार में भी सहायक है। 

डॉ एम विजय गुप्ता जी अनेक देशो के विभिन्न राष्ट्रीय स्तर के कृषि  संस्थानों में कार्य कर चुके हैं। डॉ एम विजय गुप्ता जी ने बांग्लादेश में ग्रामीण क्षेत्रो में रह रहे लोगो को मछली पालन ( Fish Farming ) के लिए न सिर्फ प्रेरित किया बल्कि उनके साथ लगकर इस हेतु कार्य भी किया एवं उन्हे इस फिश फार्मिंग के महत्वपूर्ण तरीको को भी सिखाया। 

उनके अनुसार जब तक विश्व में खाद्य सुरक्षा के इंतज़ाम नहीं होगे तब तक आप किसी भूखे व्यक्ति से शान्ति के बारे में बात नही कर सकते। खाद्य सुरक्षा एक आवश्यक विषय है जिस पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। 

Wednesday, September 2, 2015

फोटोनिक टेक्नोलोजी के बढ़ते कदम !



एक समय था जब केवल मेकेनिकल और ऑटोमोबाईल के क्षेत्र में नयी नयी मशीनो को बनाया  जा रहा था । फिर समय आया इलेक्ट्रोनिक्स का जिसमे टीवी से लेकर मोबाईल ,कंप्यूटर तक सभी प्रकार कि इलेक्ट्रोनिक्स मशीनो को बनाया  गया और इलेक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र में जितने विकास हुए शायद  ही किसी अन्य क्षेत्र में इतने हुए हो।इलेक्ट्रोनिक ने मानव जीवन को बिलकुल बदलकर रख दिया । 

यदि 20 वी सदी को इलेक्ट्रोनिक्स युग का नाम दिया जाए तो ये गलत नहीं होगा। जैसा कि आज हम सभी प्रकार के इलेक्ट्रोनिक्स यंत्रो का उपयोग कर ही रहे हैं।लेकिन जरा कल्पना करो कि क्या 21  वी सदी में इलेक्ट्रोनिक्स का स्थान कोई ले पायेगा ? ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा। लेकिन फोटोनिक टेक्नोलोजी के क्षेत्र में हो रही नई नई खोजो और इनके बड़ते उपयोग को देखकर लगता है कि ये भी इलेक्ट्रोनिक्स टेक्नोलजी से कम नहीं है।




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फोटोनिक यानी प्रकाश का उपयोग कर सूचना को हासिल करना, आगे पहुंचाना और प्रोसेस करना। यह रिसर्च का हाईटेक क्षेत्र है। इसका विकास ऑप्टिकल टेक्नोलॉजी और इलेक्ट्रॉनिक्स के फ्यूजन से हुआ है। फिजिक्स की इस शाखा में फोटॉन यानी प्रकाश के मूल तत्व का अध्ययन होता है। लेसर गन,काप्टिकल फाइबर्स, ऑप्टोमेट्रिक इंस्ट्रुमेंट्स आदि पर रिसर्च भी इसी के तहत होती है। इसे अगली पीढ़ी यानी 21वीं सदी की तकनीक माना जाता है। ठीक उसी तरह जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स को 20 वीं सदी की तकनीक माना जाता है। हालांकि फोटोनिक युग की शुरूआत 60 के दशक में लेजर की खोज के साथ ही हो गई थी। इसने 70 के दशक में टेलिकम्युनिकेशन में अपना असर दिखाया। 


इसके नेटवर्क ऑपरेटर्स ने फाइबर ऑप्टिक्स डाटा ट्रांसमिशन का तरीका अपना लिया। इसीलिए काफी पहले ही गढ़ा जा चुका शब्द फोटोनिक्स आम प्रचलन में आया 80 के दशक में। अभी कुछ सालों से टेलिकम्युनिकेशन, कंप्यूटिंग, सुरक्षा और कई अन्य प्रक्रियाओं में फोटोनिक्स का उपयोग आधारभूत तकनीक के रूप में होने लगा है। इससे न सिर्फ काम की स्पीड कई गुना बढ़ जाती है बल्कि वह प्रभावशाली भी हो जाता है। इसका उपयोग बायोटेक्नोलॉजी, माइक्रोबायलॉजी, मेडिसिनल साइंस, सर्जरी और लाइफ साइंस में भी होता है। अब औद्योगिक उत्पादन, माइक्रोबायलॉजी, मेट्रोलॉजी में भी इसका उपयोग होने लगा है। कुछ भी कहो पर विज्ञान ने 50 सालो में इतनी तरक्की कर ली है तो आगे के आने वाले 50 सालो बाद क्या होगा ?





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