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Tuesday, June 30, 2015

30 June 2015 की आखिरी मिनट 61 सेकंड की होगी !


" नासा से एक सन्देश आया है 2015  एक लीप वर्ष तो नही है किन्तु 30 जून 2015 को एक लीप सेकंड होगी। आज की आखरी मिनट 61  सेकंड की होगी ,मतलब आज का दिन साल के अन्य दिनों से एक सेकंड लम्बा होने वाला है। आज 30  जून 2015  को रात्रि के 11 बजकर 59 वे मिनटकी जब 59 वी सेकंड पूरी होगी तो  एक  सेकंड के लिए  नजारा कुछ बदल जाएगा मतलब की घडी में 23 :59 :59 के बाद 00 :00 :00   बजने की जगह  23 :59 :60  बजेंगे।"

                                   "क्या है लीप सेकंड ? आखिर  क्यों बनती  है लीप सेकंड ?" 



नासा के वैज्ञनिक Daniel MacMillan जी का कहना  है कि धरती का रोटेशन धीमे हो रहा है जिसकी वजह से आज लीप सेकंड होगी। सामान्यतः 00 :00 :00  इस समय  अगला दिन माना   जाता है, लेकिन आज 30 जून 2015 की सबसे आखरी मिनट 61 सेकंड की होने जा रही है मतलब कि 23 :59 :59  के बाद  पहले समय  23 :59 :60 होगा उसके बाद 00 :00 :00  होगा।
                    
यदि हम कोऑर्डिनेटेड यूनिवर्सल टाइम (यूटीसी) की बात  करे  तो इसके  अनुसार एक दिन में 86,400 सेकेंड्स होते है। यूटीसी एक अटॉमिक टाइम है जहा 1 सेकेंड का समय  सीसियम के एटम्स में होने वाले    इलेक्ट्रोमैगनेटिक ट्रांजिशन्स के अनुसार मापा  जाता  है। जैसा कि हम जानते हैं  कि एक दिन में 24 घंटे होते हैं मतलब 86400 सेकंड जिसको आप एक दिन की लम्बाई भी कह सकते हो। अब यहाँ आपको यह भी बता दे कि आपने एक मीन  सौर दिन ( A mean Solar Day )का नाम भी सुना ही होगा लेकिन वास्तव  एक मीन सौर दिन, यानी एक दिन की औसत लंबाई ,  पृथ्वी को रोटेशन पर ही पर लगने वाले समय की पर निर्भर करता है।




अब यदि हम इस समय की बात करे तो सामान्यत: पृथ्वी को एक रोटेशन पूरा करने में 86,400.002 सेकेंड लगते हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्यों कि धरती का  रोटेशन घट  रहा है। पिछली बार वर्ष 2012  में लीप सेकंड जोड़ा  गया  था। अब यदि हम हर दिन इस एक्स्ट्रा 0.002 सेकंड की बात करे तो औसत रूप से एक साल यानी 365  दिन में जुड़कर 0.73 सेकंड हो जाता है तो इस हिसाब से 2012 की बाद ये ये लेप सेकंड, 30 जून 2015 को  न न जुड़कर  होकर अब से ढेड  साल या उसे थोड़ा  कुछ  पहले जुड़ जाना चाहिए था। लेकिन यहाँ वैज्ञानिको  का तर्क  यह है कि हर दिन कि लम्बाई सामान नहीं  होती  लम्बाई हर रोज धरती के रोटेशन में लगने वाले समय अनुसार बदलती  है लेकिन दिन की औसत लम्बाई   86400.002 के  आस पास ही रहती है . इसलिए 2012 की बाद आज 30  जून 2015 को इस एक्स्ट्रा समय की वहज से एक सेकंड पूरी हो गयी है जिसको आज जोड़ा जाएगा।   

लीप सेकंड कब जोड़ी  जानी है यह कोई निर्धारित नहीं है सन 1972 से 1999 तक हर साल वैज्ञानिको द्वारा एक लीप सेकंड जोड़ी गयी थी।  लेकिन 2000 के  बाद से लीप  सेकंड की उपस्थिति कम  हुयी है।  यह सब धरती को एक रोटेशन में लगने वाले सटीक समय पर निर्भर करता है। 

यहाँ एक ध्यान देने वाले बात यह भी है कि वर्ष 2012  में जब यह लीप सेकंड जोड़ा गया था तब काफी कंप्यूटर क्रैश हो गए थे। 

Reference : http://www.livescience.com

Saturday, June 27, 2015

अब मस्तिष्क से बदलिये टी. वी. चैनेल / "Mind Control TV" Prototype

" मानव मस्तिष्क भी क्या कमाल की चीज़ है। मन ही मन  पलक झपकते ही मानव कुछ से कुछ विचारने लगता है।  रेगिस्तान की सैर से समुन्द्र के  किनारे  पहुंच जाता है , तो कभी बर्फीले पहाड़ो पर , एक पल में भारत के इंडिया गेट पर  तो दुसरे पल पेरिस की आईफ़िल टावर पर। एक पल में ताजमहल पर तो दुसरे पल चाइना की दीवार पर।  पलक झपकते ही मानव मस्तिष्क में चल रहा दृश्य एक दम बदल जाता है ,ठीक उसी तरह जैसे आप अपने हाथ में रिमोट के बटन से टी.वी. का चैनेल बदलते है और टी वी स्क्रीन पर दृश्य बदल जाता है। "


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अरे रुको टी. वी , रिमोट और मस्तिष्क से कुछ याद आया मुझे जो  मैं  इस पोस्ट में आपको बताने जा रहा हूँ। बात दरअसल यह है की अब आपको अपने टी.वी . के चैनेल बदलने के लिए रिमोट की  जरूरत नहीं है। अब आप अपने मस्तिष्क से ही टी.वी. चैनेल बदल सकते हो। अब ब्रेन वेब  टेक्नोलॉजी की मदद से यह संभव है।  ब्रैनवेब को पढ़कर टी. वी चैनल बदलने की इस तकनीक को यूनाइटेड किंगडम में विकसित  किया  गया  है।



मीडिया में क्षेत्र  में नामी  कंपनी  "BBC Digital" के बिज़नेस डेवलपमेंट हेड Cyrus Saihan के अनुसार यह तकनीक उन  लोगो के लिए काफी महत्वपूर्ण है जो किसी कारणवश टी.वी. के रिमोट कंट्रोल का प्रयोग नही कर पाते जैसे हाथो से विकलांग व्यक्ति . इस डिवाइस को BBC  ने लन्दन की एक तकनीकी क्षेत्र की  कंपनी के  साथ मिलकर बनाया  है जिसको उन्होने "Mind Control TV " प्रोटोटाइप  नाम दिया है।    इसके लिए आपको ब्रैनवेब को पढ़ने  वाले हेडसेट  की जरूरत पड़ती है।  BBC कंपनी के 10 सदस्यों ने इस प्रयोग  का अनुभव किया और इसको उन्होने  पूरी तरह सफल भी  बताया है। 



ब्रैनवेब (मस्तिष्क तरंग)  को पढ़ने वाले इस हेडसेट  में दो सेंसर लगे  होते  है।  हेडसेट  के जिस हिस्से में पहला  सेंसर लगा होता है उसको  प्रयोगकर्ता के माथे पर लगाया जाता है  और दूसरा सेंसर इस हेडसेट  में लगी क्लिप से जुड़ा होता है  जिसको को प्रयोगकर्ता के कान पर  लगाया  है। यह डिवाइस दो मुख्यता दो फंक्शन       के आधार  पर कार्य करती है।  ये दोनों  फंक्शन  "Concentration" एवं  "Meditation " हैं।  जिनका सम्बन्ध मस्तिष्क की " Concentration " और " Relax " अवस्था से है। इन दोनों अवस्थाओ के लेवल को प्रयोगकर्ता के सर पर लगा यह ब्रैनवेब हेडसेट  मापता है और  उसके आधार  पर ही यह चैनेल सेलेक्ट करता है और आवाज़ भी नियंत्रित करता है।  इस सम्बन्ध में अधिक  तकनीकी जानकारी   के लिए आप रिफरेन्स में दिए गए वेब साइट  एड्रेस पर जा  सकते है।



Reference :http://www.theengineer.co.uk

Thursday, June 25, 2015

माइंड तो बच्चा है जी / How to Guide Our Mind ?


हमारा माइंड एक बच्चे की तरह है। आप इसे जैसा सिखाओगे ये वैसा ही सिखने लगेगा , जैसे विचारो का भोजन इसे दोगे वैसे ही इसकी सेहत बनने लगेगी। यह उस छोटे बच्चे की तरह है ,जिसका भविष्य उन पर निर्भर करता है , जो उसका पालन पोषण करते हैं ,जो उसका ध्यान रखते हैं।  जिस तरह हम एक छोटे बच्चे को को गाइड करते हैं उसी तरह हमको अपने माइंड को भी सही चीज़ो की तरफ गाइड  करना चाहिए। 

यहाँ ध्यान देने वाली एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर आप खुद कंफ्यूज हो, तो ऐसे में आप  अपने माइंड को सही दिशा में सकारात्मक दिशा में गाइड नही कर पाओगे। ऐसे में आपका माइंड आपके साथ नही चलता और फिर वह नकारात्मक दिशा में चला जाता है।  जब आपके माइंड को यह पता होगा की किस दिशा  में जाना है तो आपके माइंड में उस दिशा में ही सकारात्मक विचार आयेगे।  

अब बात आती है कि  किस दिशा में आपका माइंड जाएगा और क्यों ? तो इसका सीधा सा जवाब है "जैसा खाओगे वैसी सेहत  पाओगे"।  अगर आपको सफलता की तरफ जाना है तो अपने दिमाग को पॉजिटिव विचार देने होगे।    नकारात्मक विचारो के साथ कभी आप अच्छा रिजल्ट नही पा सकते।  

जिस तरह हम अपने बच्चो को बुरी बातो से दूर रखते हैं ताकि उन  पर उसका असर न पड़े। उसी प्रकार हमको अपने माइंड को उन विचारो से , उन लोगो से दूर रखना होगा जो हमारी काबलियत पर शक करते हैं। हमे अपने को उनसे दूर रखना होगा ताकि उनकी बातो का असर हमारे माइंड पर न पड़े। याद रखो "जब माइंड  हो साथ , तो बन जाये  बात"



" Be Inspired, Be Positive and Move Ahead"


Tuesday, June 23, 2015

लो जी बन गया पानी से चलने वाला इंजन - Water Engine !

अरे ओ छोटू। 

हाँ चाचा। 

कछु सुनत रहो की नाय ?

का चाचा का भयो ?

अरे हम सुनत रहे कि वैज्ञानिको ने अब पानी से चलने वाला इंजन भी बना लिया है। 

चाचा अगर सच में ऐसा है तो फिर तो  पानी से चलने वाले वाहन  भी सड़क पर दौड़ते  नज़र आयेगे लेकिन जब तक ऐसे वाहन भारतीय बाज़ार में आयेगे तब तक फिलहाल यही कह सकते है कि "कब मरेगी सासु और कब निकलेगे आसूं"। 

हां शायद ऐसा ही होगा। 


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आज हम जो कल्पना करते हैं अब से कुछ सालो बाद वो सच हो जाता है। जिसको सच करता है विज्ञान। समय के साथ साथ विज्ञान के  कारण हर असंभव  काम संभव सा होता नज़ारा आ रहा है।  चाहे वो कम्प्यूटर और सुचना संचार के क्षेत्र में हो  या चिक्तसा के क्षेत्र में या ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में या फिर शिक्षा के क्षेत्र में।  आज   हम एक कल्पना करते हैं और डीजल और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों  को देखकर कहते हैं की काश  वाहन भी पानी से चला करते।  क्या ऐसा हो सकता है ? भविष्य में ऐसा हो सकता है या नही ये तो अभी नही कहा जा सकता लेकिन कुछ हद तक  वैज्ञानिक अपने इस प्रयास के काफी करीब पहुंच गये  हैं।  


 अभी हाल ही  में कोलंबिया  यूनीवर्सिटी के इंजीनियर्स  ने  एक ऐसा ही अनोखा इंजन बनाया है जो की पानी और बैक्टीरिया की मदद  से चलता  है।  इस इंजन को चलाने के लिए ऊर्जा बैक्टीरिया  से मिलती है।   जब इंजन में भरे पानी के तापमान में बदलाव आता है तो उससे वाष्प बनने लगती  है और इस  वाष्पीकरण के कारण बैक्टीरिया  के साइज में बदलाव  आने  लगता   है।  इस इंजन को बनाने वाली   टीम  के हेड  और कोलंबिया यूनीवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर Ozgur Sahin के अनुसार बैक्टीरिया पर वर्षो की रिसर्च के बाद उन्होने यह पाया की बैक्टीरिया आद्रता के प्रति संवेदनशील होते  हैं।  आद्रता कम  होने    पर बैक्टीरिया सिकुड़ने  लगते  हैं जबकि  आद्रता बढ़ने पर इनका   आकार  भी बढ़ने  लगता है।  पानी के वाष्पीकरण के कारण  बैक्टीरिया के आकार  में  होने  वाले परिवर्तन   से ऊर्जा उतपन्न  की जा सकती   है।  इसी  सिद्धांत  पर वैज्ञानिको  ने इस इंजन को बनाया है।  

Ozgur Sahin ने इस प्रकार का अभी एक छोटा सा इंजन बनाया हैं जो की चित्र में दिखाया गया है इसकी लम्बाई लगभग 5 इंच है और इससे 1.8 माइक्रोवॉट की ऊर्जा उतपन्न की जा सकती है। Ozgur Sahin  का कहना है  की भविष्य में इस इंजन की क्षमता को बढ़ाकर इसका  उपयोग बड़े वाहनो को चलाने और इलेक्ट्रॉनिक यंत्रो को चलाने के लिए ऊर्जा उतपन्न करने में भी किया जा सकता है।  इनका यह शोध कार्य " Nature Communication Journal" में हाल ही में प्रकाशित हुआ है।  इस इंजन की एक छोटी सी वीडियो आप निचे  गये  लिंक  पर क्लिक करके भी देख सकते हो। 


Reference : www.nature.com

Paper Titile : " Scaling up nanoscale water-driven energy conversion into evaporation-driven engines and generators"

Friday, June 19, 2015

Mathematics of Life


दोस्तों आज की पोस्ट केंद्रित है हमारे द्वारा किये गये  कार्यो और उनके परिणामो से।  प्रकृति का जो  नियम है उसने जो सन्देश हमको दिया है। उसको मैथमेटिक्स भी सिद्ध  करता है। आपने गणित के इन सिधान्तो के बारे में तो  पढ़ा ही होगा।   गणित की ये चारो समीकरण हमे जीने का तरीका बताती है और यही हमारी जिंदगी का सीधा और आसान सा मैथमेटिक्स है। 


  1. पहली  समीकरण बताती है कि जो कार्य सही (+) है , सकारात्मक (+) है ,यदि हम उसको नहीं (-) करते हैं , तो उसका परिणाम गलत (-) होता है या दुसरे शब्दों में कह सकते हैं की सही काम को ना करने का हमको नुक्सान (-)उठाना पड़ता है।   
  2. दूसरी समीकरण बताती है कि जो काम हमको नही (-) करना चाहिए या जो गलत (-)है यदि हम वह करते (+) हैं तो तब भी हमको नुक्सान (-) उठाना पड़ता है। उसका नतीजा गलत (-)मतलब नकारात्मक ही होता है। 
  3. तीसरी समीकरण आपको बताती है की जो काम अच्छा है सही है सकारात्मक(+) है यदि हम उस काम को करते (+)हैं तो हमको सकारात्मक (+) परिणाम मिलता है। 
  4. चौथी समीकरण बताती है जो काम गलत (-) है जो काम हमको नही करना चाहिए।  यदि हम उसको नही (-)  करते  हैं तो उसका परिणाम भी अच्छा (+) होता है, सही होता है। 


अब आप बताओ क्या इसको समझने के लिए किसी एम बी ए, या पी.एच .डी की जरूरत है भैया ? क्या कोई तकनीकी ज्ञान की जरूरत है भैया ? पर  दुःख की बात तो यह है की हम सब ये डिग्री हासिल करने के बाद भी इनका अनुसरण नही करते  हैं। 

"So be inspired and follow these equations in your life and be happy and make happy others"


Wednesday, June 17, 2015

"सुचना एवं संचार तकनीक" के क्षेत्र में भारत की स्थिति !

सन 2000   के बाद "सुचना एवं  संचार तकनीक" के क्षेत्र में  जो महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ हैं उसने  दुनिया  के अनेक देशो की अर्थ व्यवस्था को एक नई ऊचाई तक पहुचाया है। सुचना एवं संचार तकनीक ने ना  सिर्फ  आज जहा एक और बहुत दूर रह रहे अपनों को करीब ला दिया है ,बल्कि  हमारे जीवन शैली को ही बदल कर रख दिया है।  जिसका उपयोग और परिवर्तन हम अपने चारो और देख ही रहे हैं।  सुचना एवं संचार  के इस परिवर्तन की इस क्रान्ति में  लगभग सभी देशो ने तरक्की की। वर्तमान समय में हर कोई इसका उपयोग कर रहा है।  हाल ही में एक  ग्लोबल इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी रिपोर्ट जारी की गयी है। इस रिपोर्ट के अनुसार सामाजिक  एवं आर्थिक प्रभावों को ध्यान  में रखते हुए सुचना एवं संचार तकनीक के क्षेत्र का उपयोग कर  तरक्की कर  रहे अनेक देशो की एक रैंक तैयार की गयी है।  इस रिपोर्ट अनुसार  सिंगापुर इस क्षेत्र में   प्रथम स्थान पर है।  यह रिपोर्ट में जारी की गयी रैंक 53  कारको को ध्यान  में रखते हुए तैयार की गयी  है, जिनमे उस देश का वातावरण , सुचना एवं संचार  को अपनानी की उत्सुकता , उसका उपयोग एवं उसके प्रभाव ये चार करक प्रमुख हैं। 


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इस रिपोर्ट में 143  देशो की  रैंकिंग की गयी है। इस रिपोर्ट के अनुसार सबसे बेहतर और सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाले देशो के बीच एक बहुत बड़ा अंतर  नजर आता है।  सबसे बेहतर रैंक  वाले देशो ने 2012  के बाद से  ख़राब रैंक वाले देशो की तुलना में  इस क्षेत्र में काफी सुधार किया है। इस रिपोर्ट में  अमेरिका और  जापान भी टॉप टेन में शामिल हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार BRICS देशो की परफॉरमेंस थोड़ी निराशाजनक रही है।  इस रिपोर्ट के अनुसार  सुचना एवं संचार के क्षेत्र में तरक्की  की नज़र से रूस  की रैंक 41 है , चीन की रैंक 62 ,साउथ अफ़्रीका की 75 , ब्राज़ील की 84  और भारत की  रैंक 89  है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है  कि BRICS  देशो में शामिल भारत की रैंक सबसे BRICS देशो में सबसे कम है।  

इस रिपोर्ट में सुचना एवं संचार तकनीक के क्षेत्र में तरक्की  करने वाले टॉप टेन देशो  में क्रमश: सिंगापुर , फ़िनलैंड ,स्वीडन,नीदरलैंड, नॉर्वे ,स्विट्जरलैंड, अमेरिका ,इंग्लैंड ,लक्सेम्बर्ग एवं जापान को शामिल किया गया है।   हम आशा करते हैं की अगली ग्लोबल इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी  रिपोर्ट में भारत की रैंक अच्छी हो।

Monday, June 15, 2015

आँखों की सकारात्मक और नकारात्मक भाषा !

अक्सर जब हम किसी से बात करते हैं तो हमसे बात करने वाला व्यक्ति  हमारे शब्दों के साथ साथ हमारी बॉडी लैंग्वेज पर भी ध्यान देता है।  हमारी शारीरिक भाषा हमारी सकारात्मक और नकारात्मक छवि का प्रदर्शन करती है।  हमारी शारीरिक भाषा में हमारे चलने  का तरीका , किसी से बात करते समय हमारे हाथो का मूवमेंट , हमारे बैठे का तरीका  , हमारे चेहरे के हाव भाव , किसी से हमारे हाथ मिलाने का तरीका आदि चीज़ो पर विशेष ध्यान दिया जाता है।  इन सभी में हमारे आँखों की भाषा सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है क्यों कि जब हम किसी से बात कर रहे होते हैं तो हमसे बात कर रहे व्यक्ति की नज़र सीधे हमारे चेहरे पर होती है। 

यदि आप कोई इंटरव्यू देने जा रहे हैं  या फिर आपकी  अपने बॉस के साथ कोई ऑफिसियल मीटिंग है  या जब आप किसी नए व्यक्ति से मिलते हैं या आपको कोई प्रेजेंटेशन देनी है या कोई लेक्चर देना है तो इन सभी परीस्थितियों में अपनी सकारात्मक छवि के प्रदर्शन के लिए आपको आँखो भाषा के बारे में पता होना जरूरी है। सकारात्मक छवि बताने वाली आँखों कि भाषा को धीरे धीरे अपनी आदत में शामिल करकर  हम खुद को एक कॉंफिडेंट पर्सनालिटी के रूप में खुद को  दुसरो के समक्ष पेश कर सकते हैं और नकारत्मक भाषा से बच सके  होने वाले   नुक्सान  से खुद को बचा सकते हैं    और  अपने कार्य   को सफल बना  सकते हैं। 

तो  फिर देर किस बात की है आइये  जानते हैं आँखों की भाषा के बारे में  कहती हैं आपकी आँखे -

  • जब आप किसी से आँखे निचे करके बात करते हो तो यह प्रदर्शित करता है कि  आप बात करते समय  घबरा रहे हो  या नर्वस हो रहे हो, भावुक होने पर भी अक्सर ऐसा होता है। यह एक कॉन्फिडेंट पर्सनालिटी का लक्षण नहीं है। 
  • जब आप अपने चेहरे पर हल्की मुस्कान लिए सामने वाले से आँखे मिलाकर बात करते हो तो यह आपकी सकारात्मक सोच आपके रुचि  को दर्शाता है। यह आपकी कॉन्फिडेंट पर्सनालिटी को प्रदर्शित करता है। 
  • जब आप किसी बात करते समय अपनी आँखों को बायीं तरफ ले जाते हो या बायीं तरफ देखने की कोशिश   करते हो तो यह प्रदर्शित करता है की आप उस समय आप कुछ याद करने की कोशिश  कर रहे हो। 
  • जब आप किसी बात करते समय अपनी आँखों को  दांयी  तरफ ले जाते हो या दांयी  तरफ देखने की कोशिश   करते हो तो यह प्रदर्शित करता है की आप कुछ क्रिएटिव सोच रहे हो या कुछ प्लान कर रहे हो।  
  • किसी से बात करते समय अगर आप बार बार आँखों को इधर उधर करते हो तो यह प्रदर्शित करता है कि  उस समय  आप कुछ झूठ बोल रहे हो या छिपा रहे हो। 
  • किसी से बात करते समय अगर आप ऊपर की तरफ देख रहे हो तो यह प्रदर्शित करता है कि उस समय आप अपने मष्तिष्क में फोटो /चित्र के साथ कुछ विचार कर रहे हो। 
  • अगर आप किसी से बात करते समय अक्सर बार बार अपनी आँखों को निचे कर लेते हो तो यह प्रदर्शित करता है कि आप सामने वाले व्यक्ति से बात करने में खुद को असुरक्षित या कष्टप्रद महसूस कर रहे हो।    

कुछ और भी भाषाए होती हैं आँखों की जैसे  रोना , किसी पर गुस्सा  करना , किसी  के प्रति प्यार व्यक्त करना आदि। याद रखे कि किसी से बात करते समय आपकी आँखे बहुत कुछ ऐसा कह देती  हैं जिसका आपको पता भी नहीं लगता और फिर उस बात का परिणाम आने पर आप कहते हो ऐसा  कैसे हो  गया ?  इसलिए सचेत रहिये और एक सकारात्मक प्रदर्शित करिये। 

Saturday, June 13, 2015

Relationship between Month of Birth and Disease

विदेशो  में आये दिन विभिन्न विषयो पर अक्सर बहुत ही रोचक रिसर्च और सर्वे होते रहते हैं। ऐसा ही एक रिसर्च अभी हाल  में अमेरिका में में की गयी है। जो कि अमेरिकावासियो के जन्म के महीने  और उनको होने वाली बिमारी के बीच सम्बन्ध बताती है। इस रिसर्च के अनुसार वह जो व्यक्ति मार्च के महीने में जन्म लेते हैं उनको अधिकतर  गंभीर बीमारियो का सामना करना पड़ता है जैसे हार्ट से सम्बंधित अधिकतर बिमारी एवं इस "Mitral Vaue Disorder "  .  इस शोध के  अनुसार यह भी पाया गया कि अमेरिका जो बच्चे अक्सर जुलाई और अक्टूबर में जन्म लेते हैं वह मुख्यता : अस्थमा की बीमारी की शिकार होते हैं। 

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिको ने एक ऐसी कम्प्यूटेशनल अलगोरथिम् बनायी हैं जो जन्म  के महीने और होने वाली बीमारी के बीच सम्बंध  बताती है।  इस रिसर्च के रिजल्ट की जांच के लिए शोधकर्ताओं ने न्यूयॉर्क शहर के मेडिकल डेटाबेस का परीक्षण किया और 55  बीमारियो का उन व्यत्कियो के  जन्म के  महीने से एक विशेष सम्बन्ध पाया। शोधकर्ताओं ने पाया कि अमेरिका में जो बच्चे मई में जन्म लेते हैं उनको बीमारिया कम होती हैं और जो अक्टूबर में जन्म लेते हैं उनके बीमार रहने की सम्भावनाये जायदा होती हैं।  "Columbia University Medical Center " के Biomedical Informatic के  असिस्टेंट प्रोफेसर Nicholas Tatonetti के अनुसार यह रिसर्च कुछ  नयी   बीमारियो को खोजने और उनसे होने वाले नुक्सान का जानने में वैज्ञानिको के लिए मददगार साबित होगी। इस शोध के शोधकर्ताओं ने अमेरिका के कुछ अन्य शहर और कुछ अन्य देशो में भी इस शोध को जांचने का मन बनाया है ताकि इसकी गुणवत्त्ता का और अधिक सही पता लग सके।  इस रिसर्च को अंजाम देने के लिए शोधकर्ताओं ने न्यूयॉर्क  शहर के NewYork-Presbyterian/CUMC के 1985  से 2013 के  बीच का मेडिकल डेटाबेस को स्टडी किया जिसमे उन्होने  लगभग 1.7 मिलियन मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री की जांच   की।  शोधकर्ताओं की यह रिसर्च "Journal of American Medical Informatics Association" में प्रकाशित हो चुकी है। 

Keywords : Birth month, disease, America

Reference : www.usatoday.com




Thursday, June 11, 2015

"Know Stress.............. for No Stress " ( Stress Management )

आज हर कोई तनाव से ग्रषित हैं। कभी कभी तनाव कुछ समय के लिए या कुछ परिस्तिथि में होता है उसके बाद हम तनावमुक्त होते हैं। लेकिन आज कल ये तनाव हमारी जिंदगी में कुंडली मारकर बैठ गया है और हमारी जिंदगी का ही एक हिस्सा बन गया है। इसकी कई वजह हो सकती है अक्सर हम दो तरह की जिंदगी जीते हैं एक पर्सनल लाइफ और दूसरी प्रोफेशनल लाइफ और इन दिनों के बीच बैलेंस नहीं बना पाना तनाव का एक बहुत बड़ा कारण  है।  आज हम  तनाव लेने और देने में इतने एक्सपर्ट हो गए हैं कि किसी से हसकर मुस्कुराकर बात करना तो भूल ही गए चाहे घर हो या बाहर हम टेंसन लेते और देने की मशीन बन गए हैं। 

तीन शब्द  शब्द होते हैं, प्रेशर  ,टेंशन और  स्ट्रेस।  

  • टेंसन का सम्बन्ध  हमारी पॉजिटिव और नेगेटिव  एनर्जी लेवल के अधिक और कम होने से है जो कि प्रेशर के कारण होता है।
  •  प्रेशर का सीधा सम्बन्ध अपने काम को समय से पूरा न कर पाने से है। 
  • जब हम लगातर टेंसन में रहने के आदि हो जाते हैं तब हम स्ट्रेस कि स्टेज में आ जाते है। जिसको हम हर पल वक़्त महसूस करते हैं। स्ट्रेस के हमको दिए गए जो प्रमुख उपहार हैं। उनमे डायबिटीज , कैंसर ,दिल से सम्बंधित रोग ,गुस्सा आना  ,बैक पेन और पेट रोग आदि हैं। 


जब हमारी इच्छाए बढ़ती जाती हैं और हम उनको अपने पास उपलब्ध साधनो और पैसो से उनको पूरा करने में असमर्थ रहते हैं तब हम धीरे धीरे स्ट्रेस कि और बढ़ने लगते है।  इसका मतलब ये नही कि हम अपनी इच्छाओ को मार दे या उनका त्याग कर दे बिलकुल नही और जो ऐसा कहते हैं मै नहीं सही  मानता उनको।   तो स्ट्रेस कम करने के लिए जरूरी है एक तो आप अपने बाहरी प्रेशर को कम करे।  छोटी छोटी बात पर टेंसन न ले और दुसरे अपने अंदर की  क्षमताओ को बढ़ाये ताकि आप अपनी इच्छाओ को पूरा कर सको। 

दरसल बात यह है कि आज के समय में हम  अपनी हेल्थ पैसा कमाने में लगा देते  है और मजे की बात यह है कि आगे चलकर हम यही पैसा हेल्थ कमाने मतलब हेल्थ को सही करने में लगाने लगते हैं।  इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हम शारीरिक व्यायाम  भी करे। 

आपकी हेल्थ आपसे यही कह रही है कि मुझ  पर ध्यान दो "कही ऐसा न हो कि मेरे जाने पर फिर तू रोवे "   और आप अपनी  हेल्थ से कहते रह जाओ कि "मत जा री , मत जा ,मत जा री , मत जा"। इसलिए दोस्तों स्ट्रेस लेना बंद करो और जीना शुरू करो।

Tuesday, June 9, 2015

Importance of Know Yourself and Believe in Yourself

अक्सर हम जिंदगी के सफर में सफलता की राह से भटक जाते हैं। कभी शुरवात में भटकते हैं, तो कभी बीच में, तो कभी मंजिल तक पहुचने से थोड़ा पहले। यह भटकाव कई कारणों से हो सकता है।  सफलता तक न पहुंच पाने  का एक बहुत बड़ा कारण  यह भी है कि  हम को खुद पर भरोसा  नही होता और हम अपनी क्षमताओ को सही से पहचान नही पाते या फिर अपनी क्षमताओ को कम आंकने लगते हैं। 

हमे अपनी क्षमताओ, अपनी विशेषताओ के बारे में पता होना बहुत जरूरी है। आप इसे कुछ इस तरह से समझो कि  जब तक किसी सेल्समेन को अपने प्रोडक्ट के बारे में  सही से नही पता होगा तब तक आप उससे उसका प्रोडक्ट नही खरीदोगे।  जितना खुद को जानोगे , अपनी ताकत, अपनी अच्छाईओ के बारे जानोगे, उतना खुद के करीब होते जाओगे। अगर आपको लगता है की आप प्रमोशन के लायक नही हो तो धीरे धीरे आपके बॉस को भी यही लगने लगेगा की आप प्रोमोशन के लायक नही हो।  जब आपको अपनी शक्तियों अपनी खुबिया का पता होगा तो आपको अपनी वैल्यू अपना महत्व  पता लगेगा तभी दुसरे भी आपमें विश्वाश  करेंगे। 

कभी कभी हमारे पास आईडिया तो होते हैं पर खुद पर विश्वास  न होने के कारण हम शुरुवात नही करते ऐसे में याद रखो :

                                  ( IDEA + BELIEVE =  SUCCESS  )
                         
किस्मत पर विश्वास करके मत बैठे रहो।  करना है तो करना है। अक्सर आपके पास   दो विकल्प होते  है या तो करो या फिर छोड़ो।  जैसे ही आप  "करो" वाले विकल्प को चुनते हो और खुद को उसमे रखते  हो तो आपके भीतर कॉन्फिडेंस आना शुरू हो जाता है।  लेकिन जैसे ही आप सही समय के इंतज़ार में या किस्मत के भरोसे या भगवान भरोसे  चीज़ो को छोड़ देते हो तो आप दूसरे विकल्प को चुन लेते हो। 

इसको याद रखो  और काम पर लग जाओ। 

                  "मंजिल मिल ही जायेगी , देर से ही सही ,गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं "

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