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Monday, April 20, 2015

"बिरूबाला राभा" तुम्हे सलाम !

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अरे ओ छोटू !

हाँ चाचा !

कछु सुनत रो कि नाय !

का चाचा ?का भयो?

अरे हम सुनत रहे कि  हाल ही में आसाम यूनिवर्सिटी ने "बिरुबाला राभा" नाम की 5  वी  कक्षा पास महिला को डॉक्टरेट की उपाधि दी है। 

चाचा इस पाचवी कक्षा पास महिला ने डॉक्टरेट उपाधि रखने वाले  लोगो से भी कही जयदा बहादुरी का काम किया है। अगर आज देश की हर महिला "बिरुबाला राभा" बन जाए तो किस झाड़ फूक करने वाले ठोंगी बाबा में या किसी और में कहा इतना दम है, जो हमारे देश में  अंधविश्वास , जादू टोन का खौफ  फैलाकर अपना मतलब सीधा कर सके। 

हाँ शायद ऐसा ही होगा !

आज इस पोस्ट में मैं जिनका परिचय आप लोगो से कराने जा रहा हूँ, वैसे से तो आपने हाल फिलहाल अखबारों में या पहले भी कहि इनके बारे में सुन रखा होगा।  लेकिन फिर भी इस महान औरते के जज्बे को सलाम करते हुए मैं आपसे इनका परिचय करना जरूरी समझता हूँ। क्यों की आज के समय में ऐसी महिलाओ की समाज को बहुत जरूरत है ताकि देश को अंधविश्वास से  मुक्ति मिल सके।  


इनका नाम है "बिरूबाला राभा".  इनकी उम्र 61 वर्ष  है और इन्होने केवल 5  वी कक्षा तक  शिक्षा ग्रहण की है।    लेकिन ये आज के समय में उन पढ़ी  लिखी महिलाओ और पुरुषो से कहीं श्रेष्ठ हैं जो कला ,विज्ञान , डॉक्टरी , इंजीनियरिंग में उच्च  शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी अंधविश्वास में यकीन रखते  हैं। हाल ही में गुवाहाटी यूनिवर्सिटी  ने  इन्हे डॉक्टरेट के उपाधि से नवाजा है। 

आसाम के ठाकुरकाला गाँव  की यह आदिवासी महिला 20  साल से जादू टोन और अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई लड़ रही हैं और अब तक 45  से ज्यादा लोगो की जाने बचा चुकी हैं।  जिसमे चार पुरुष हैं। जादू टोन और अंधविस्वास के खिलाफ उनकी इस लड़ाई का सफर इतना आसान नही रहा। उनको इन २० सालो में कई बार जान से मार देने की धमकी मिली तो कई बार उन पर जानलेवा हमला भी हुआ। उनको गाव छोड़ने को भी कहा गया लेकिन फिर भी इस महिला ने हार नही मानी। 

इस अंधविश्वास और जादू टोने के प्रति लड़ने की उन्होने जब से ठानी जब सन 1991  में उनके बड़े बेटे धर्मवीर को कोई मानसिक बीमारी हुयी और गॉव के एक झाड़ फूंक करने वाले ने उस पर भूतो का साया  बताया ओर कहा की उसकी तीन दिन में मौत हो जायेगी और उसे गाव से बहार फेकने का फरमान सुनाया।  लेकिन यह महिला अपने बेटे के लिए पूरे गाव से लड़ी और उनका बेटा आज भी जिन्दा है और शिलांग के मानसिक अस्पताल में है। 


उन्होने अपने घर और गाव से शुरुवात करते हुए अपने आस पास के गाव तक जादू टोने और अंधविस्वास के खिलाफ जागरूकता फैलाने का काम किया। 2006  में "असोम महिला समता सोसाइटी" ने उन्हे अपने साथ जोड़ा। अब इन्होने न केवल अंद्विश्वास बल्कि रेप और दहेज़ जैसी घटनाओ के विरुद्ध भी लड़ना शुरू कर दिया। इन्होने एक ऐसी महिला की जान बचाई जिसको गाव वाले पेड़ से उल्टा लटकर पीट रहे थे क्यों की किसी कमवख्त मनहूस ने उस बेचारी महिला  पर भूत का साया बताया था।  बिरूबाला राभा जी के अनुसार उनके यहाँ गाव के कुछ रुतबे वाले लोग गरीबो जमीन हड़पने के लिए जादू टोने का नाटक करते हैं। उस गरीब को जादू टोने का शिकार बताकर उसे गाव से बहार फिकवा दिया जाता था और उसकी जमीन हड़प ली जाती थी। ऐसी सी एक घटना तब घाटी जब एक औरत  ने एक युवक के साथ शारीरिक सम्बन्ध न बनाने पर उस औरत को भूत प्रेत का साया बताकर उसे मरवा दिया गया।  

2008  में देश के नामी रिलायंस इंडस्ट्री इन्हे "रियल हीरो" के रूप  में सम्मानित कर चुकी है।  सन  2005  में इनका  नाम नोबेल पुरूस्कार के लिए भी भेजा गया था। आज के समय में न केवल ग्रामीण क्षेत्रो में बल्कि शहरी इलाको में भी ऐसी महिलाओ की शख्त जरूरत है। 

4 comments:

  1. बहुत बढ़िया सार्थक प्रस्तुति ..
    बिरूबाला राभा को सलाम!

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  2. बहुत सुंदर और सार्थक.

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  3. Nice..:)
    Please do check mine and vote:
    https://www.indiblogger.in/indipost.php?post=452573

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  4. बहुत अच्छी पहल है। ये हमारे देश की विडम्बना ही है की
    विज्ञानं के इस युग में भी लोग अंधविश्वासों पर ध्यान देते हैं
    और अगर पढ़े लिखे लोग भी ऐसे आडम्बरों में शामिल हो
    तो मन और भी व्यथित हो जाता है।

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