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Sunday, February 1, 2015

खटनी भाग 2 !

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 पिछली पोस्ट में बचपन के एक विशाल वृक्ष खटनी ( 1930-1995)  के लिए कुछ पंक्तिया लिखी,  इसके लिए  भाग 2 में कुछ पंक्तियाँ  इस प्रकार हैं -


अनेक पक्षी आकर इस पर,
 अपना घौंसला बनात्ते थे !
सभी सुबह होते उड़ जाते , 
शाम को फिर अपने घर आ जाते थे !!

इन पक्षियों का ये प्यारा घर था ,
सभी इसकी डाल पर ख़ुशी से  चहचाहते  थे !!

एक था वो भयानक साया ,
जो खटनी की जिंदगी में  आया !
आखिर इसके मालिक ने ,
पैसो की खातिर इस पर आरा चलवाया !!


,और फिर गिर गया धरा पर,
 बिखर गए इसके सभी अंग !
बेघर हो गए जाने कितने,
 पक्षी इसकी यादो क संग !!


वो ले जा रहे थे इसके अंगो को,
 और भरने लगे इन्हे ट्रॉली में !
हम सब बेबस होकर देख रहे थे ये दृश्य,
 और आँशु गिरने लगे झोली में !!

फिर वो ले गए उसको ऐसे,
 जैसे कोई मरे हुए को ले जाता है!
अब न कोई ऐसा खटनी है ,
जो दो गाव को आम खिलाता है !!

मालिक की भी थी ,
कोई आर्थिक परेशानी !!
वरना जिस खटनी को 65 सालो तक पाला,
 कौन खोना चाहेगा ऐसी प्यारी  निशानी !!

                                          - मनोज कुमार 

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