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Sunday, October 12, 2014

आ तुझे काट खाऊँ !

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कुछ दिन पहले  जब अपने एक मित्र के साथ दिल्ली से आगरा  जा रहा था तो रास्ते में जोरो से भूख लग रही थी , जैसी ही हमारी बस एक ढाबे  पर रुकी तो हमने वह थोड़ी पेट पूजा की , मगर इस पेट पूजा ने मेरे अंदर के दर्द को इतनी बुरी तरह से करौंद दिया जिससे  इस लेख की उत्पत्ति हो  गयी. जब ढाबे में अंदर गए तो हमने वहा खाने में ४ आलू पराठे और दो हाफ दही का आर्डर दिया , आर्डर देते समय हमने रेट मालूम नही किया , पराठो की क्वालटी ऐसी थी की आपका देखकर ही मन भर  जाए खाना तो दूर की बात , खैर भूख जोर से लग रही थी हमने जैसे तैसे उनको खाया , खाने के बाद जब बिल दिया तो मेरे अंदर एक अजीब से दर्द की अनुभूति हो रही थी , बिल बना 280 रूपये का 50 रूपये प्रति पराठा  और 80 रूपये की 2 हाफ दही . बिल देकर ऐसा लगा जैसे मै  ने उस ढाबे वाले के पराठे नही खाए बल्कि उसने मुझे काट खाया हो . बिल देते समय जब मैने  उसकी शक्ल देखा तो मानो जैसे वो मुझसे कह रहा हो " आ तुजे काट खाऊँ ". कुछ देर बाद बस चली  और हम आगरा  पहुंचे , हम  बस से उतर कर सिटी में ऑटो से जा रहा थे, तभी मेरी नज़र शहर में लगे एक होर्डिंग पर पड़ी , जिस पर विज्ञापन के पोस्टर में लिखा था , आपके सपनो का घर 2 BHK  फ्लैट मात्र 35 लाख में , मुझे डर लगा मै ने उस होर्डिंग से अपनी नज़र हटा ली , वो भी यही कह  रहा हो "आ तुजे काट खाऊँ

कभी कभी सोचता हूँ की बचपन कितना अच्छा था काश अब से 20 साल पहले वाले समय में सारी जिंदगी गुजर जाती।   बचपन में जेब में 50 पैसे भी होते थे तो लगता था हम राजा हैं , अब इस महंगाई की दीमक ने सारी इच्छाओं का दमन कर दिया है , सपनो को देखना  ही छोड़  दिया  । मै कुछ जयदा समय पहले की नही 2004 की ही बात करता हूँ , उस समय चीनी 14 रूपये किलो , डीजल 20 रूपये  लीटर , सब्जियों के दाम भी 10 रूपये किलो से कम ही रहते थे , 2 रूपये की चाय , 5 रूपये के दो समोसे , 20 रूपये में अच्छी खाने  की थाली , 10 रूपये दर्जन केला . अजी अब किस किस चीज़ के दाम गिनाऊँ आपको मतलब ये कह लो की हर किस चीज़ के तब के दामो में और अब के दामो में इतना अंतर दिखाई देता  है कि अब हिम्मत नही होती कुछ भी खरीदने  की , और एक सुन्दर घर हो अपना  ये सपना तो बस सपना ही बनकर रह गया है  , जमीन के दामो ने आसमान को ऐसे छु रखा है की अब धरती पर आना ही नही चाहते , कहा से घर बनाये साहब , अब तो किसी भी  दूकान में कदम रखते ही डर लगता है हर दूकान वाले की शक्ल यही कहती है "आ तुजे काट खाऊँ "






इस महंगाई का बोझ अब ढोह नहीं पा रहा हूँ , चल ही नही पा रहा आगे इसके साथ बोझ काम करने के लिए बस सपनो का गाला घोटकर आगे चलने की कोशिश कर रहा हूँ.  अगर सही में देखा  जाए तो इन दस सालो में आदमी की महीने की तनख्वाह उस अनुपात में नही बढ़ी जिस अनुपात में ये महंगाई बाद गयी , हाँ जिनकी ऊपर की कमाई मोटी है उनकी बात मै नही कर रहा हूँ , और शायद ऐसे ही लोगो की वजहें से आज ये महंगाई बढ़ी है क्यों की जिनके पास पैसा है उनके लिए महंगाई कम है , कुछ लोग इस महंगाई में  खुश हैं क्यों की इसी से ही उनकी जेबे और घरो में  रखी तिजोरिया , उनके बैंक  खाते सब भरे पड़े है , वही कुछ गरीब हैं जो इतनी तकलीफ में हैं जी रो रो कर जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं, बच्चो की महँगी  पढ़ाई का खर्च  , अस्पताल  की फीस , डॉक्टर का इलाज़ कहा से कराएं ? इच्छाओ को पूरा करना तो दूर जरूरत की चीजो पर भी मन मारकर रह जाते हैं उनको ही नही पूरा कर पाते 

शायद इस देश के कुछ लोग इस देश का सब कुछ हड़प लेना चाहते है , ये जमीन ,ये हीरे जेवरात, ये  धन दौलत ये सब कुछ , लोग अमीर बनने की दौड़ में इतने मतलबी हो गये  हैं की दुसरे के लिए कुछ छोड़ना ही नही चाहते , उनके दुःख दर्द को समझना  ही नही चाहते ,  अगर खुद को दुःख होता है तो दुःख समझ में आता है अगर दूसरो को होता है तो हमे कोई फरक नही पड़ता ,  इस भूख  में इतने अंधे हो गए हैं की सब दूसरो को काटकर खाने में लगे हुए हैं । कब तक हम दूसरो को ये महसूस कराते रहेंगे की " आ तुझे काट खाऊँ ". अगर ऐसा ही चलता  रहा तो वो दिन दूर नही होगा जब  इस भूख में खुद ही कट  जायेंगे  आज भी उस गरीब आदमी की कही ये  पंक्ति मुझे याद आती है - "साहब मेरे बच्चे भी मेरी गरीबी की समझ रखते हैं, तभी तो घर के वर्तनो को अपना खिलौना बन लेते हैं " 

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8 comments:

  1. सभी लोग बहुत जल्दी अमीर बन जाना चाहते हैं, इसके लिए वे किसी भी स्टार पर गिरने को तैयार है. बेईमानी बढ़ती जा रही है. सुन्दर आलेख आपका.

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  2. काट खाउँ
    म्याऊँ म्याऊँ
    हम भी इस बार दिल्ली रेलवे स्टेशन पर 100 का एक परोंठा खा कर आये थे इसी तरह :) दिखाये थाली में सजे चार थे रुपिये लेने के बाद एक थमा दिया आधा मैंने सूँघा आधा बीबी को बोल दिया सँभाल कर रख दे ।

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  3. महंगाई का हाल बुरा है। सामयिक विषयों पर आपका लेखन अच्छा लगा।

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  4. नीरज जी , सुशील जी और शारदा जी आप सभी मेरे ब्लॉग अपर आये आपने मेरी पोस्ट पढ़ी , इसके लिए आपका शुक्रिया ! आशा करता हूँ की आगे भी आपका मार्गदर्शन मुझे मिलता रहेगा !

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  5. Aapne har us vyakti ki peeda likh daali hai jo mahangaayi se aahat hai..har koi apne sapno ko maar raha hai kyunki roz marra ki zarurate hi mushkil se puri hoti hai aadmi kahan se sapne dekhe aur use pura kare... Nisandeh... Dil se nikali peeda seedha dil ko chuthi hai.dubhar ho gya hai ab zameen par rahna ... !!

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  6. सामयिक विषयों पर सुन्दर आलेख आपका !

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  7. Janab samooche desh me sapane bik rahe koi Ghar bech raha hai koi koi electronic samaan. Par har ek ka daam apne hisaab se set hai . Aapki abhivyakti umda hai

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  8. सभी पाठकगणो का शुक्रिया !

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