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Thursday, April 3, 2014

मै कुछ ढूंढ़ता हूँ !!

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सूरज की तपिश में नरमी को ढूंढ़ता हूँ !
तपती हुयी दोपहरी में पेड़ो की छाँव ढूंढ़ता हूँ !!
जिस देश में होती थी कभी पेड़ पौधों की पूजा !
उस देश में अब उस खोयी हुयी खुशहाली को ढूंढ़ता हूँ !!







राजनीती में अक्सर उस राज को ढूंढ़ता हूँ !
जो करे देश की जनता का भला ऐसे प्रयास ढूंढ़ता हूँ !!
 बस इस देश में एक नये संचार को ढूंढ़ता हूँ !
मैं  कुछ ढूंढ़ता हूँ ,बस यही सब  कुछ ढूंढ़ता हूँ  !!

       
      
नोट – ये मेरी कविता के कुछ अंश है जिनको मै यहाँ शेयर कर रहा हूँ इसको कोई अन्य अपने नाम से प्रकाशित न करे !

4 comments:

  1. बहुत सार्थक और सुन्दर अभिव्यक्ति...शुभकामनायें!

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  2. अगर वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें तो कमेंट देने में सुविधा रहेगी...

    ReplyDelete

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