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Thursday, December 23, 2010

खिलते नहीं है फूल अब तो मेरे बाग़ में……………….

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ये क्या हो गया है अब मेरे चमन को
इस प्यारे वतन को , उस नियारे वतन को !
खिलते थे कभी जहा फूल मोहबत के ,
अब वही पर नफरत के फ़साने लिखे जाते है ,
हर तरफ मच रहा है शोर भिरास्ताचार का,
इस बढती महंगाई का , इस बड़ते अपराध का !
सूख गये है पौधे , अब इस बाग़ में ,
खिलते नहीं है फूल अब तो मेरे बाग़ में !
एक वो भी समय था जब, वो दुःख तकलीफ मेंअपना सहारा दिया करते थे।,
अब तो दूर से नज़र चुरा लेते है ,
मिलते भी है तो बस हाय हेल्लो ,टाटा बाय बाय किया करते है।
क्यों होता जा रहा है ये , अब क्यों बढ़ रही है रिश्तो में दूरिया।
क्या कमी हम सब में है , या फिर ये है जमाने कि खामिया।
मिलती नहीं है खूसबू प्यार की अब तो मेरे बाग़ में,
खिलती नहीं बहार , चैन और अमन की अब तो मेरे बाग़ में!
खिलते नहीं है फूल अब तो मेरे बाग़

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