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Sunday, August 23, 2015

सेल्फ़ी लेते समय शिष्टाचार एवं सभ्यता का रखे ध्यान !

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" Why young generation is so hungry for selfi ? "

आज कल हम अपने आस पास के माहौल में अक्सर देखते हैं कि युवा वर्ग  में ( चाहे वो लड़के हो या लडकियां ) सभी में सेल्फ़ी लेने का क्रेज इस कदर बढ़ता जा रहा है कि अक्सर वो सेल्फ़ी लेते समय जगह और माहौल का भी ध्यान नहीं रखते।  सेल्फ़ी लेने के जनून  में इतने खो जाते हैं कि दूसरो कि भावनाओ का भी ध्यान नही रहता , बल्कि यह भी ध्यान नही देते कि कही हमारी सेल्फ़ी की वजह से पास वालो को तो कोई  समस्या नही हो रही है। 

छात्र वर्ग के लोगो में ही नही बल्कि 30  से 40  तक आयु वाले व्यक्ति भी सेल्फ़ी लेते समय इन बातो का ध्यान नही रखते। हमको अक्सर देखने को मिलता है कि जब हम किसी रेस्टोरेंट , कॉफी शॉप , पिज़्ज़ा   शॉप आदि में बैठकर में खा पी रहे होते हैं तो सेल्फ़ी लेने लगते हैं , यह भी ध्यान नही देते कि उस सेल्फ़ी के कारण कही हमारे आस पास  बैठे अन्य व्यक्ति खुद को असहज तो महसूस नहीं कर रहे। इसी तरह का माहौल हमको अक्सर  मॉल , पार्क आदि में दखते हैं। जहा देखो वह युवाओ में सल्फी लेने कर क्रेज बढ़ता ही जा रहा है ऐसे  में कभी कभी हम माहौल का ध्यान भी नही रखते। 

हाल ही में इसका एक उदाहरण  के जाने माने अभिनेता अमिताभ  बच्चन जी के साथ हुआ जिस पर उन्होने  कहा की जब मै  अपने एक मित्र के अंतिम संस्कार में पंहुचा तो वह खड़े कुछ लोग सेल्फ़ी लेने लगे। उन्होने इस बात पर शख्त नाराजगी जताई थी।  क्या  ये लोग इतने असंवेदनशील  हो गए हैं की माहौल  का भी ध्यान नहीं रखते की हम कहा खड़े हैं ? वहा  क्या हो रहा है ?

ऐसा ही एक दूसरा उदाहरण  मुझे खुद कुछ दिन पहले फेसबुक पर एक फोटो में दखने को मिला।  जब नयी दिल्ली  में जहा हमारे पूर्व राष्टपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ ए. पी .जी अब्दुल कलाम साहब का पार्थव शरीर को रखा गया था ,वहा खड़े एक युवक ने उनके पार्थिव शरीर  के साथ सेल्फ़ी ली जिसमे पीछे से एक युवक  हसता  हुआ उस  सेल्फ़ी में साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था।  अब आप बताये ये कहा की संवेदनशीलता है क्या ऐसे मौको पर भी ये लोग बिना सेल्फ़ी लिए नहीं रह सकते।  




मानव व्यवहार पर सेल्फ़ी लेने की आदत के  पड़ने वाले प्रभाव  के बारे  हाल ही में नयी दिल्ली के  बी.एल.के सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के एक  वरिष्ठ मनोचिकित्सक एस. सुदर्शनन का कहना है कि शोकाकुल माहौल में सेल्फी लेना पूर्ण  रूप से असभ्यता का प्रतीक  है और इसे रोकने   की जरूरत है। यदि होम मानव व्यवहार के विशेषयज्ञो  की माने तो सेल्फ़ी  को आम तौर पर तीन प्रकार में  सकते हैं  । पहला वह जो दोस्तों  परिवार वालो  के साथ ली जाती है जैसे  रेस्टॉरेंट में ,कॉफी शॉप पर, कॉलेज में या किसी दार्शनिक स्थल पर  , दूसरी वह जो किसी समारोह के दौरान ली जाती है जैसे शादी , बर्थडे पार्टी आदि में  और तीसरी वह जिसका ध्यान भौतिक उपस्थिति पर होता है  जिसमे  बड़े बड़े जाने माने  लोगो के साथ सेल्फ़ी लेना भी शामिल है। 

ऐसे में युवा वर्ग खकसर छात्रों के लिए सेल्फी के इस्तेमाल पर रोक  लगाना संभव नही होगा  लग भी दी तो यह कुछ हालातो में सही भी नही होगा  । इसके लिए  जरूरी है कि माता पिता  और अध्यापक दोनों ही अपने स्तर पर युवाओं से सेल्फी लेने की आदत  और सामाजिक शिक्षा से जुड़े विभिन्न तथ्यों पर बात करे । 

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, 'छोटे' से 'बड़े' - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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